गुरुवार, 6 मई 2021

कोरोना त्रासदी : मोदी सरकार की गलतियों से भुगत रहा पूरा देश

वैज्ञानिकों की चेतावनी के बाद भी कोविड 19 पर जीत की जश्न मना रही थी सरकार




‘‘हद तो तब और ज्यादा हो गई जब प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से मास्क पहनने और सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन करने को कहा, पर वे खुद पाँच राज्यों में होने वाले चुनावों की रैलियों को संबोधित कर रहे थे. इन विशालकाय रैलियों में जुटी हजारों की भीड़ में से ज्यादातर के चेहरे पर से मास्क नदारद थे. इसके अलावा, उत्तराखंड के हरिद्वार में लाखों की भीड़ जुटाने वाले कुंभ मेले को भी यही सरकार ने मंज़ूरी दी. इसका मतलब है कि खुद सरकार ने महामारी फैलाने के लिए हरिद्वार में लाखों की भीड़ जुटाने वाले कुंभ मेले को मंजूरी दी थी.’’

नई दिल्ली : सोमवार को केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पत्रकारों से कहा कि अब दिल्ली या देश में कहीं भी ऑक्सीजन की कमी नहीं है. लेकिन, उनसे महज कुछ ही किलोमीटर दूर पर कई छोटे अस्पताल सरकार को ऑक्सीजन खत्म होने के बारे में इमरजेंसी मैसेज भेजकर मरीजों की जान बचाने की गुहार लगा रहे थे. बच्चों के एक अस्पताल के मुख्य डॉक्टर ने बताया कि हमारा कलेजा मुँह में आया हुआ था, क्योंकि ऑक्सीजन के खत्म होने पर बच्चों के मरने का खतरा था. ऐसे में वहाँ के एक स्थानीय नेता की मदद से समय पर ऑक्सीजन सप्लाई अस्पताल को मिल सकी. इसके बाद भी, केंद्र सरकार बार-बार जोर देकर कह रही है कि देश में ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कई डॉक्टरों ने कहा है कि वे केवल उन रोगियों को ऑक्सीजन दे रहे हैं, जिन्हें इसकी सख़्त जरूरत है.लेकिन ऐसा करने पर भी ऑक्सीजन कम पड़ रही है. वहीं जानकारों का कहना है कि ऑक्सीजन की कमी, उन कई समस्याओं में से एक है, जिनसे पता चलता है कि केंद्र और राज्य दोनों कोरोना की दूसरी लहर के लिए तैयार नहीं थे. इसलिए वे दूसरी लहर से हो रहे नुकसान को रोकने या कम करने के लिए पर्याप्त इंतजाम करने में विफल हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, बार-बार कई चेतावनी जारी की गई थी. नवंबर में स्वास्थ्य मामलों की स्थायी संसदीय समिति ने कहा था कि देश में ऑक्सीजन की सप्लाई और सरकारी अस्पतालों में बेड दोनों अपर्याप्त हैं. इसके बाद फरवरी में कई जानकारों ने बताया था कि उन्हें निकट भविष्य में ‘कोविड सूनामी’ का डर सता रहा है. इतना ही नहीं, मार्च की शुरुआत में सरकार के ही बनाए वैज्ञानिकों के एक विशेषज्ञ समूह ने कोरोना वायरस के कहीं अधिक संक्रामक वेरिएंट को लेकर अधिकारियों को चेताया था. एक वैज्ञानिक ने बताया कि इस बारे में रोकथाम के कोई अहम उपाय न करने पर चेतावनी दी गई थी. सरकार ने इन आरोपों का कोई जवाब नहीं दिया है. इसके बावजूद, 8 मार्च को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने कोरोना महामारी के खत्म होने की घोषणा कर दी. ऐसे में सवाल उठता है कि गलती सरकार करे और इसका खामियाजा देश की जनता क्यों भुगते? सरकार की भयानक गलतियों का ही नतीजा है कि लाखों परिवार अपनों की जान गंवाकर भुगत रहे हैं.

गौरतलब है कि जनवरी और फरवरी में कोरोना के रोजाना के मामलों की संख्या घटकर 20,000 से भी नीचे पहुंच गई थी. इससे पहले सितंबर में रोज 90 हजार से अधिक मामले सामने आ रहे थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना को हरा देने का ऐलान कर दिया, जिसके बाद लोगों के मिलने-जुलने के सभी जगहों को खोल दिया गया. इस तरह ऊपर से भरमाने वाले ऐसे संदेश मिलने के बाद लोग जल्द ही कोविड प्रोटेक्शन प्रोटोकॉल को भूल से गए.

हद तो तब और ज्यादा हो गई जब प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से मास्क पहनने और सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन करने को कहा, पर वे खुद पाँच राज्यों में होने वाले चुनावों की रैलियों को संबोधित कर रहे थे. इन विशालकाय रैलियों में जुटी हजारों की भीड़ में से ज्यादातर के चेहरे पर से मास्क नदारद थे. इसके अलावा, उत्तराखंड के हरिद्वार में लाखों की भीड़ जुटाने वाले कुंभ मेले को भी यही सरकार ने मंज़ूरी दी. इसका मतलब है कि खुद सरकार ने महामारी फैलाने के लिए हरिद्वार में लाखों की भीड़ जुटाने वाले कुंभ मेले को मंजूरी दी थी.

घटिया पब्लिक पॉलिसी और हेल्थ सिस्टम
पब्लिक पॉलिसी और हेल्थ सिस्टम के जानकार डॉ. चंद्रकांत लहरिया ने बताया कि प्रधानमंत्री ने जो कहा और किया उसमें कोई मेल नहीं था. वहीं जाने-माने वायरोलॉजिस्ट डॉ. शाहिद जमील ने बताया, सरकार दूसरी लहर को भांप नहीं पाई और बहुत जल्दी इसके खत्म होने का जश्न मनाना शुरू कर दिया. इन सभी बातों के अलावा, इस तबाही ने कई और चीजों को सामने ला दिया है. इस आपदा ने अच्छे से बता दिया कि भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य का ढांचा कितना कमजोर और बेहद घटिया है. अस्पतालों के बाहर बिना इलाज के दम तोड़ने वाले लोगों को देखकर केवल दिल नहीं नहीं दहल रहे हैं. ये नजारे बता रहे हैं कि हेल्थ सेक्टर के बुनियादी ढांचा बिल्कुल घटिया बना दिया गया है.

बताते चलें कि एक जानकार ने बताया कि भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य का ढांचा हमेशा से टूटा हुआ रहा है. चाहे वर्तमान में बीजेपी की सरकार हो या पूर्ववर्ती कांग्रेस की सरकार रही हो. दोनों सरकारों ने भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य का ढांचा को घटिया बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. पहले भी अमीर और मध्य वर्ग जो लोग सक्षम थे वे अपने और परिवार के इलाज के लिए निजी अस्पतालों पर निर्भर थे और गरीब लोग डॉक्टर से दिखाने के लिए जूझ रहे थे और आज भी जूझ रहे हैं.


भारत में हर 10,000 लोगों पर 10 से भी कम डॉक्टर
यह कितनी हैरान करने वाली बात है कि इस समय देश महामारी के भयंकर दौर से गुजर रहा है. इसके बाद भी डॉक्टरों की कमी की चिंता सरकार को नहीं है. भारत में हर 10,000 लोगों पर 10 से कम डॉक्टर हैं. कुछ राज्यों में तो यह आंकड़ा पांच से भी कम है. अगर संकट काल में सरकार की योजनाओं की बात करें तो भले ही मोदी सरकार ने संकट के दौरान कई बड़ी घोषणाएं की हो लेकिन, सभी घोषणाएं जुमले साबित हुए हैं. स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी सरकार की हाल ही की योजनाओं जैसे स्वास्थ्य बीमा और गरीबों के लिए सस्ती दवा भी लोगों को मदद नहीं दे पा रही है. वह इसलिए कि मेडिकल स्टाफ या अस्पतालों की संख्या बढ़ाने के लिए कांग्रेस या बीजेपी ने बीते दशकों में बहुत कम प्रयास किया है.

अगर निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों को मिलाकर देखें तो पिछले छह सालों में भारत का स्वास्थ्य पर खर्च जीडीपी का लगभग 3.6 फ़ीसदी रहा है. 2018 में यह ब्रिक्स के सभी पांच देशों में सबसे कम है. सबसे अधिक ब्राजील ने 9.2 फीसद, जबकि दक्षिण अफ्रीका ने 8.1 फीसद, रूस ने 5.3 फीसद और चीन ने 5 फीसदी खर्च किया है. यदि विकसित देशों की बात करें तो वे स्वास्थ्य पर अपनी जीडीपी का कहीं ज्यादा हिस्सा खर्च करते हैं. 2018 में, अमेरिका ने इस सेक्टर पर 16.9 फीसदी जबकि जर्मनी ने 11.2 फीसदी खर्च किया था. भारत से कहीं छोटे देशों जैसे श्रीलंका और थाईलैंड ने भी हेल्थ सेक्टर पर कहीं ज्यादा खर्च किया है. श्रीलंका ने अपनी जीडीपी का 3.79 फीसदी इस मामले में खर्च किया, जबकि थाईलैंड ने 3.76 फीसदी. 

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