गुरुवार, 6 मई 2021

संकट का समाधान करने के बजाए बदतर करते जा रहे प्रधानमंत्री

 


प्रधानमंत्री जी आप कुर्सी खाली करो, यह संकट आप ही की देन : अरुंधति रॉय

‘‘हम अपने घरों में, सड़कों पर, अस्पतालों में, खड़ी कारों में, बड़े महानगरों में, छोटे शहरों में, गांव में, जंगलों और खेतों में मर रहे हैं. मैं एक सामान्य नागरिक के तौर पर अपने स्वाभिमान को ताक पर रखकर करोड़ों लोगों के साथ मिलकर कह रही हूं कि महोदय! कृपया, अब तो कम से कम कुर्सी से उतर जाइए, यह संकट आप की ही देन है. आप इसका समाधान नहीं निकाल सकते हैं, आप इसे सिर्फ बद से बदतर करते जा रहे हैं. अगर आप पद से नहीं हटते हैं तो, हममें से लाखों लोग बिना किसी वजह के मारे जाएंगे.’’

♦ मोदी का पीएम पद से न हटना लाखों लोगों की बेवजह मौत
♦ संकट का समाधान निकालने के बजाए पीएम की कुर्सी खाली करो

नई दिल्ली : कोविड महामारी के इस भीषण संकट के समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जबावदेही का यही एक काम कर सकते हैं कि वे अपनी कुर्सी छोड़ दें. हमें सरकार की जरूरत है बहुत बुरी तरह से जो हमारे पास है नहीं. सांस हमारे हाथ से निकलती जा रही है, हम मर रहे हैं. हमारे पास यह जानने का भी कोई सिस्टम नहीं है कि जो मदद मिल भी रही है, इसका इस्तेमाल कैसे हो पाएगा. हम 2024 आने का इंतजार नहीं कर सकते हैं. मेरे जैसे इंसान ने कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा भी कोई दिन आएगा जब हमें प्रधानमंत्री से किसी भी चीज के लिए याचना करनी होगी. यह बात जानी मानी लेखिका अरूंधति रॉय ने अपने एक लेख में कही है.


उन्होंने कहा कि निजी तौर पर मैं उनसे कुछ भी मांगने से पहले जेल जाना पसंद करती. लेकिन आज, जब हम अपने घरों में, सड़कों पर, अस्पतालों में, खड़ी कारों में, बड़े महानगरों में, छोटे शहरों में, गांव में, जंगलों और खेतों में मर रहे हैं. मैं एक सामान्य नागरिक के तौर पर अपने स्वाभिमान को ताक पर रखकर करोड़ों लोगों के साथ मिलकर कह रही हूं, महोदय! कृपया, अब तो कम से कम कुर्सी से उतर जाइए, इस समय मैं आपसे हाथ जोड़ती हूं कि आप कुर्सी से हट जाइए. यह संकट आप की ही देन है, आप इसका समाधान नहीं निकाल सकते हैं, बल्कि आप इसे सिर्फ बद से बदतर करते जा रहे हैं.


रॉय ने आगे कहा, यह विषाणु भय व घृणा और अज्ञानता के माहौल में फलता-फूलता है. यह उस समय फलता-फूलता है जब आप बोलने वालों को प्रताड़ित करते हैं. यह तब होता है जब आप मीडिया को इस तरह प्रतिबंधित कर देते हैं कि असली सच्चाई सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ही बताई जाती है. यह तब होता है जब आपका प्रधानमंत्री अपने प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करता है, जड़वत कर देने वाले इस भयावह क्षण में भी जो किसी भी सवाल का जवाब देने में सक्षम नहीं है. अगर आप पद से नहीं हटते हैं तो, हममें से लाखों लोग बिना किसी वजह के मारे जाएंगे.


एकांतवास में आप अपनी आगे की जिंदगी सुकून से जी सकते हैं. आपने खुद कहा था कि आप ऐसी ही जिंदगी बसर करना चाहते हैं. इतनी बड़ी संख्या में लोग इसी तरह मरते रहे, तो वैसा संभव नहीं हो सकेगा. आप विपक्ष मुक्त लोकतंत्र की परिकल्पना नहीं कर सकते हैं. वही निरंकुशता कहलाता है. इस विषाणु को निरंकुशता भाती भी है. अभी यदि आप ऐसा नहीं करते हैं, क्योंकि इस प्रकोप को तेजी से एक अंतरराष्ट्रीय समस्या के रूप में देखा जाने लगा है जो पूरी दुनिया के लिए खतरा है. और आपकी अक्षमता दूसरे देशों को हमारे आंतरिक मामले में हस्तक्षेप करने का वैधता दे रही है कि वह कोशिश करके और मामले को अपने हाथ में ले ले. यह हमारी संप्रभुता के लिए लड़ी गई कठिन लड़ाई से समझौता होगा. इसलिए कृपया आप गद्दी छोड़ दीजिए. जवाबदेही का यही एक काम आप कर सकते हैं. आप हमारे प्रधानमंत्री होने का नैतिक अधिकार खो चुके हैं.

भारत में कोरोना की विकराल स्थिति अन्य देशों के लिए भी खतरे की घंटी : यूनिसेफ


नई दिल्ली : भारत कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है. इस बीच यूनिसेफ ने कहा है कि भारत में कोविड-19 स्थिति हम सभी के लिए खतरे की घंटी है. वायरस से संबंधित मौतों, वायरस के उत्परिवर्तन और आपूर्ति में देरी के मामले में दुनिया भर में कदम उठाने चाहिए और मदद करनी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र के बच्चों की एजेंसी के प्रमुख ने ये बातें कही है.


संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) ने भारत में 20 लाख फेस शील्ड और 200,000 सर्जिकल मास्क के अतिरिक्त अन्य मदद की है. यूनिसेफ के कार्यकारी निदेशक हेनरिटा फोर ने मंगलवार को कहा, भारत में दुखद स्थिति हम सभी के लिए खतरे की घंटी है. उन्होंने कहा, जब तक दुनिया कदम नहीं उठाती है और भारत की मदद नहीं करती है, वायरस से संबंधित मौतों, वायरस के उत्परिवर्तन और आपूर्ति में देरी के मामले में क्षेत्र और दुनिया भर में पुनर्मूल्यांकन होगा. भारत कोविड-19 की दूसरी लहर के बीच में है. आज भी चार लाख से अधिक नए मामले सामने आए हैं और 4 हजार के करीब मरीजों की इस महामारी ने जान ले ली है.


विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, भारत में कोरोना के 2 करोड़ 6 लाख से अधिक कोरोना केस हैं. अभी तक 2 लाख 26 हजार से अधिक मरीजों की जान चली गई है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दक्षिण एशिया क्षेत्र के देशों में संक्रमणों में वृद्धि देखी जा रही है. भारत में दुनिया के 46 प्रतिशत संक्रमण के मामले और 25 प्रतिशत के करीब मौत के मामले हैं. एशिया की बात करें तो यहां 90 प्रतिशत से अधिक मामला और कोरोना से होने वाली मौत की संख्या अकेले भारत में है.


दक्षिण एशिया के लिए यूनिसेफ के क्षेत्रीय निदेशक जॉर्ज लारिया-अदजेई ने एक बयान में कहा कि तबाही को रोकने के लिए तत्काल कार्रवाई और दृढ़ नेतृत्व की आवश्यक्ता है. लारिया-अदजेई ने कहा, सरकारों को तबाही को रोकने के लिए अपनी शक्ति के भीतर सब कुछ करना चाहिए. सहायता भेजने वाले साझेदारों को तुरंत सहायता भेजनी चाहिए. अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को बिना किसी देरी के कदम उठाना चाहिए.


लारिया-अडजाई ने कहा, यह केवल एक नैतिक अनिवार्यता नहीं है. दक्षिण एशिया में घातक नया उछाल हम सभी को धमकाता है. अगर इसे जल्द से जल्द नहीं रोका गया तो यह यह महामारी के खिलाफ कड़ी मेहनत से अर्जित वैश्विक लाभ को उल्टा करने की क्षमता रखता है, अगर जल्द से जल्द रोका नहीं गया है. यूनिसेफ ने कहा कि जो दृश्य हम दक्षिण एशिया में देख रहे हैं वह पहले की तुलना में विपरीत है. उन्होंने कहा, मरीजों के परिवार के सदस्य मेडिकल ऑक्सीजन के लिए गुहार लगा रहे हैं. स्वास्थ्य कर्मचारी भी थक चुके हैं. इससे हमारी स्वास्थ्य प्रणाली तनावपूर्ण हो जाएगी. दक्षिण एशिया में टीकाकरण की धीमी रफ्तार भी चिंता का कारण है, इससे स्थिति और विकराल हो सकती है.

मीडिया को रिपोर्टिंग का अधिकार लेकिन मद्रास हाईकोर्ट की भाषा सख्त : सुप्रीम कोर्ट

 चुनाव आयोग की याचिका पर तरस

‘‘चुनाव आयोग द्वारा कोरोना महामारी के भयंकर संकट में जहां चुनाव कराने से पांचों राज्य महामारी का केंद्र बन गया है वहीं सुप्रीम कोर्ट ने कहा, चुनाव आयोग ने चुनाव कराकर डेमोक्रेसी को मजबूत किया है.’’

नई दिल्ली/दै.मू.ब्यूरो
कभी-कभी सुप्रीम कोर्ट का फैसला और टिप्पणी पक्षपाती लगने लगता है. ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के ऊपर किसी का दबाव है. शायद इसी दबाव में आकर सुप्रीम कोर्ट पक्षपाती बन जाता है. हाल ही में मद्रास हाईकोर्ट ने महामारी के दौर में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव कराने और तेजी से वायरस फैलने से हो रही लोगों की मौत को लेकर चुनाव आयोग पर हत्या का मामला दर्ज करने का बयान दिया था. इसके साथ ही मीडिया के रिपोर्टिं पर भी मद्रास हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग को घेरा था. लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, मीडिया को रिपोर्टिंग का अधिकार है. परन्तु, मद्रास हाईकोर्ट की भाषा सख्त है. इतना ही नहीं, चुनाव आयोग द्वारा कोरोना महामारी के भयंकर संकट में जहां चुनाव कराने से पांच राज्य महामारी का केंद्र बन गया है वहीं सुप्रीम कोर्ट ने कहा, चुनाव आयोग ने चुनाव कराकर डेमोक्रेसी को मजबूत किया है.


गौरतलब है कि मद्रास हाईकोर्ट द्वारा निर्वाचन आयोग पर हत्या का मामला कायम करने की टिप्पणी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका पर बुधवार को फैसला आया. इस दौरान कोर्ट ने आयोग और हाईकोर्ट, दोनों को निर्देश और सलाह दी. सुप्रीम कोर्ट ने यह बात भी स्पष्ट की है कि मीडिया के पास रिपोर्टिंग का अधिकार है. कोर्ट ने कहा कि कोर्ट रूम में जो भी होता है उसको रिपोर्ट करना मीडिया का अधिकार है.


कोर्ट ने आगे कहा इस मामले में दो संवैधानिक संस्था है. हमें दोनों को बैलेंस करना होगा. कोरोना के मामले में सभी हाई कोर्ट ने अच्छा काम किया है. वहीं चुनाव आयोग ने भी चुनाव कराकर डेमोक्रेसी को मजबूत किया है. मद्रास हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग पर जो टिप्पणी की वो कोरोना के हालात की वजह से था. लेकिन, उनकी भाषा सख्त थी. इसकी जरूरत नहीं थी. हाई कोर्ट को भाषा के इस्तेमाल पर ध्यान देना होगा.


जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि मद्रास हाईकोर्ट ने जो कहा वो सिर्फ मौखिक था. रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं था. इसलिए उसे रद्द करने की जरूरत नहीं है. चुनाव आयोग की मीडिया पर रोक लगाने की मांग खारिज की जाती है. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि आयोग को भी आदेशों का पालन सुनिश्चित करना चाहिए था. खंडपीठ ने फैसले में मद्रास हाईकोर्ट के संदर्भ में कहा कि टिप्पणी और फैसले में उपयोग की जाने वाली भाषा संवैधानिक मूल्यों के प्रति संवेदनशील होनी चाहिए.

विदेश मंत्री जयशंकर का बड़ा बयान, कहा पूरी तरह चरमरा गई है भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था


लंदन : विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कोविड-19 वैश्विक महामारी की दूसरी लहर को बहुत बड़ी चुनौती बताया और दुनिया भर के देशों की सद्भावना को कूटनीति में एकजुटता की भावना बताकर उनका स्वागत किया. जी-7 विदेश एवं विकास मंत्रियों की बैठक में अतिथि मंत्री के तौर पर हिस्सा लेने के लिए चार दिवसीय यात्रा पर ब्रिटेन पहुंचे, जयशंकर ने माना कि भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि टीकाकरण कार्यक्रम को बढ़ाने और वैश्विक महामारी की तात्कालिकता के इतर भी देश की जरूरतों को समझने के लिए एक योजना तैयार की गई है.

    उन्होंने ब्रिटेन स्थित मीडिया संगठन इंडिया इंक ग्रुप और लंदन में भारतीय उच्चायोग द्वारा आयोजित वैश्विक संवाद श्रृंखला के एक कार्यक्रम में कहा, भारत को संकट के इस क्षण में एहसास है कि पूरी दुनिया हमारे साथ है. जयशंकर ने कहा, हम इससे उबर जाएंगे, लेकिन इस सबसे एक बड़ा सबक मिलता है... एकजुटता की भावना है. मैं लंदन में यहां यह महसूस कर रहा हूं क्योंकि लगभग सभी देश उससे गुजर चुके हैं जिससे फिलहाल हम गुजर रहे हैं. वे हमारे लिए भावनाएं रखते हैं.

कोरोना त्रासदी : मोदी सरकार की गलतियों से भुगत रहा पूरा देश

वैज्ञानिकों की चेतावनी के बाद भी कोविड 19 पर जीत की जश्न मना रही थी सरकार




‘‘हद तो तब और ज्यादा हो गई जब प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से मास्क पहनने और सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन करने को कहा, पर वे खुद पाँच राज्यों में होने वाले चुनावों की रैलियों को संबोधित कर रहे थे. इन विशालकाय रैलियों में जुटी हजारों की भीड़ में से ज्यादातर के चेहरे पर से मास्क नदारद थे. इसके अलावा, उत्तराखंड के हरिद्वार में लाखों की भीड़ जुटाने वाले कुंभ मेले को भी यही सरकार ने मंज़ूरी दी. इसका मतलब है कि खुद सरकार ने महामारी फैलाने के लिए हरिद्वार में लाखों की भीड़ जुटाने वाले कुंभ मेले को मंजूरी दी थी.’’

नई दिल्ली : सोमवार को केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पत्रकारों से कहा कि अब दिल्ली या देश में कहीं भी ऑक्सीजन की कमी नहीं है. लेकिन, उनसे महज कुछ ही किलोमीटर दूर पर कई छोटे अस्पताल सरकार को ऑक्सीजन खत्म होने के बारे में इमरजेंसी मैसेज भेजकर मरीजों की जान बचाने की गुहार लगा रहे थे. बच्चों के एक अस्पताल के मुख्य डॉक्टर ने बताया कि हमारा कलेजा मुँह में आया हुआ था, क्योंकि ऑक्सीजन के खत्म होने पर बच्चों के मरने का खतरा था. ऐसे में वहाँ के एक स्थानीय नेता की मदद से समय पर ऑक्सीजन सप्लाई अस्पताल को मिल सकी. इसके बाद भी, केंद्र सरकार बार-बार जोर देकर कह रही है कि देश में ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कई डॉक्टरों ने कहा है कि वे केवल उन रोगियों को ऑक्सीजन दे रहे हैं, जिन्हें इसकी सख़्त जरूरत है.लेकिन ऐसा करने पर भी ऑक्सीजन कम पड़ रही है. वहीं जानकारों का कहना है कि ऑक्सीजन की कमी, उन कई समस्याओं में से एक है, जिनसे पता चलता है कि केंद्र और राज्य दोनों कोरोना की दूसरी लहर के लिए तैयार नहीं थे. इसलिए वे दूसरी लहर से हो रहे नुकसान को रोकने या कम करने के लिए पर्याप्त इंतजाम करने में विफल हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, बार-बार कई चेतावनी जारी की गई थी. नवंबर में स्वास्थ्य मामलों की स्थायी संसदीय समिति ने कहा था कि देश में ऑक्सीजन की सप्लाई और सरकारी अस्पतालों में बेड दोनों अपर्याप्त हैं. इसके बाद फरवरी में कई जानकारों ने बताया था कि उन्हें निकट भविष्य में ‘कोविड सूनामी’ का डर सता रहा है. इतना ही नहीं, मार्च की शुरुआत में सरकार के ही बनाए वैज्ञानिकों के एक विशेषज्ञ समूह ने कोरोना वायरस के कहीं अधिक संक्रामक वेरिएंट को लेकर अधिकारियों को चेताया था. एक वैज्ञानिक ने बताया कि इस बारे में रोकथाम के कोई अहम उपाय न करने पर चेतावनी दी गई थी. सरकार ने इन आरोपों का कोई जवाब नहीं दिया है. इसके बावजूद, 8 मार्च को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने कोरोना महामारी के खत्म होने की घोषणा कर दी. ऐसे में सवाल उठता है कि गलती सरकार करे और इसका खामियाजा देश की जनता क्यों भुगते? सरकार की भयानक गलतियों का ही नतीजा है कि लाखों परिवार अपनों की जान गंवाकर भुगत रहे हैं.

गौरतलब है कि जनवरी और फरवरी में कोरोना के रोजाना के मामलों की संख्या घटकर 20,000 से भी नीचे पहुंच गई थी. इससे पहले सितंबर में रोज 90 हजार से अधिक मामले सामने आ रहे थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना को हरा देने का ऐलान कर दिया, जिसके बाद लोगों के मिलने-जुलने के सभी जगहों को खोल दिया गया. इस तरह ऊपर से भरमाने वाले ऐसे संदेश मिलने के बाद लोग जल्द ही कोविड प्रोटेक्शन प्रोटोकॉल को भूल से गए.

हद तो तब और ज्यादा हो गई जब प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से मास्क पहनने और सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन करने को कहा, पर वे खुद पाँच राज्यों में होने वाले चुनावों की रैलियों को संबोधित कर रहे थे. इन विशालकाय रैलियों में जुटी हजारों की भीड़ में से ज्यादातर के चेहरे पर से मास्क नदारद थे. इसके अलावा, उत्तराखंड के हरिद्वार में लाखों की भीड़ जुटाने वाले कुंभ मेले को भी यही सरकार ने मंज़ूरी दी. इसका मतलब है कि खुद सरकार ने महामारी फैलाने के लिए हरिद्वार में लाखों की भीड़ जुटाने वाले कुंभ मेले को मंजूरी दी थी.

घटिया पब्लिक पॉलिसी और हेल्थ सिस्टम
पब्लिक पॉलिसी और हेल्थ सिस्टम के जानकार डॉ. चंद्रकांत लहरिया ने बताया कि प्रधानमंत्री ने जो कहा और किया उसमें कोई मेल नहीं था. वहीं जाने-माने वायरोलॉजिस्ट डॉ. शाहिद जमील ने बताया, सरकार दूसरी लहर को भांप नहीं पाई और बहुत जल्दी इसके खत्म होने का जश्न मनाना शुरू कर दिया. इन सभी बातों के अलावा, इस तबाही ने कई और चीजों को सामने ला दिया है. इस आपदा ने अच्छे से बता दिया कि भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य का ढांचा कितना कमजोर और बेहद घटिया है. अस्पतालों के बाहर बिना इलाज के दम तोड़ने वाले लोगों को देखकर केवल दिल नहीं नहीं दहल रहे हैं. ये नजारे बता रहे हैं कि हेल्थ सेक्टर के बुनियादी ढांचा बिल्कुल घटिया बना दिया गया है.

बताते चलें कि एक जानकार ने बताया कि भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य का ढांचा हमेशा से टूटा हुआ रहा है. चाहे वर्तमान में बीजेपी की सरकार हो या पूर्ववर्ती कांग्रेस की सरकार रही हो. दोनों सरकारों ने भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य का ढांचा को घटिया बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. पहले भी अमीर और मध्य वर्ग जो लोग सक्षम थे वे अपने और परिवार के इलाज के लिए निजी अस्पतालों पर निर्भर थे और गरीब लोग डॉक्टर से दिखाने के लिए जूझ रहे थे और आज भी जूझ रहे हैं.


भारत में हर 10,000 लोगों पर 10 से भी कम डॉक्टर
यह कितनी हैरान करने वाली बात है कि इस समय देश महामारी के भयंकर दौर से गुजर रहा है. इसके बाद भी डॉक्टरों की कमी की चिंता सरकार को नहीं है. भारत में हर 10,000 लोगों पर 10 से कम डॉक्टर हैं. कुछ राज्यों में तो यह आंकड़ा पांच से भी कम है. अगर संकट काल में सरकार की योजनाओं की बात करें तो भले ही मोदी सरकार ने संकट के दौरान कई बड़ी घोषणाएं की हो लेकिन, सभी घोषणाएं जुमले साबित हुए हैं. स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी सरकार की हाल ही की योजनाओं जैसे स्वास्थ्य बीमा और गरीबों के लिए सस्ती दवा भी लोगों को मदद नहीं दे पा रही है. वह इसलिए कि मेडिकल स्टाफ या अस्पतालों की संख्या बढ़ाने के लिए कांग्रेस या बीजेपी ने बीते दशकों में बहुत कम प्रयास किया है.

अगर निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों को मिलाकर देखें तो पिछले छह सालों में भारत का स्वास्थ्य पर खर्च जीडीपी का लगभग 3.6 फ़ीसदी रहा है. 2018 में यह ब्रिक्स के सभी पांच देशों में सबसे कम है. सबसे अधिक ब्राजील ने 9.2 फीसद, जबकि दक्षिण अफ्रीका ने 8.1 फीसद, रूस ने 5.3 फीसद और चीन ने 5 फीसदी खर्च किया है. यदि विकसित देशों की बात करें तो वे स्वास्थ्य पर अपनी जीडीपी का कहीं ज्यादा हिस्सा खर्च करते हैं. 2018 में, अमेरिका ने इस सेक्टर पर 16.9 फीसदी जबकि जर्मनी ने 11.2 फीसदी खर्च किया था. भारत से कहीं छोटे देशों जैसे श्रीलंका और थाईलैंड ने भी हेल्थ सेक्टर पर कहीं ज्यादा खर्च किया है. श्रीलंका ने अपनी जीडीपी का 3.79 फीसदी इस मामले में खर्च किया, जबकि थाईलैंड ने 3.76 फीसदी.